Monday, 28 December 2015

मैं भी कितना पागल था, तितलियों के नाम रखा करता था...

मैं भी कितना पागल था
तितलियों के नाम रखा करता था...
***
जब फूल खिलते थे
मैं तुम्हारा अक्स ढूँढा करता था...
मैं भी कितना पागल था
तितलियों के नाम रखा करता था...
***
तपती धूप में
सर्द हवाओं में
बारिशों में
मैं तेरे पीछे-पीछे भागा करता था...
मैं भी कितना पागल था
तितलियों के नाम रखा करता था...
***
जब तुम नहीं आती थी
तेरी यादों में उलझा -उलझा रहता था
सुबह से शाम तक उदास इंतज़ार करता रहता था
मैं भी कितना पागल था
तितलियों के नाम रखा करता था...
***
मैं भूल गया था
तितलियों के तो पंख भी होते हैं
खुशबू की चाहत में वोह दूर उड़ जाती हैं
फिर कभी लौट कर नहीं आ पाती...
फासले बढ़ जाते हैं...
मैं भी कितना पागल था
तितलियों के नाम रखा करता था...
***
रोमिल मैं भी कितना पागल था...

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